چهارشنبه ۱۹ آذر
شعر حماسی
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ای لئیمان!
هان بیاشامید!
آبهای ناتمام حوضِ دنیا را
هان بیاشامید!
کین کم است این دوزخین جانِ شما
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من پارسیم؛
از فرّهِ کیانی سرشته،
از نژادِ کیخسروِ نیرومِهر،
آن شاهِ آذرنگی
که اَهوراییترین فروغ
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پروانه ها امشاسپندان ها فراوان ها
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بی بی آمده است
شرف را
مجلسِ تشییع است
تشریف شرف را
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✍️ تصنیف سرا: م. مدهوش ( یامور)🕊️
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ای استودان سنگی خاموش و استوار
ای پلکان کهنه ی تاریخ ماندگار
ای چله گاه آتش و باران و خاک و
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کجایید فراموشکاران بی انصاف
که جهان دوباره خسته میشود
از عدالتی که به خواب رفت
از کودکی
که
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آرش برآمد از دل ایران که جان فدا کند به راه پیمان
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غزل
«زاهدانه_لافتا»
لافتا، در جنگ شد،
نامش، به نام یا علی(ع)
ذوالفقار است، فاطمه(س)،
آن
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میرپنجی باید،نادری دیگر،
باطنین اندیشه و زوزهٔ تبر.
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بُرون شو از عبثِ «مازِ» گربه رقصان ها
نَرَقص با طربِ سازِ گربه رقصان ها
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عصای دست من رنگش سفیده
مسیر زندگیم رو به امیده
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بر سر تخت عروسی، زعفر آن شاه جنان
غرق شادی و طرب، مستِ بزم دوستان
جامهی دامادی از زر، تاجی از
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خوش باد آن که یاد خوش جبهه ها کند..
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بانوی کهن ای فروغ تاریخ
ای آینهدار کاخ زرمیخ
در دامن خاک تیره خفته
وز تابش نور ماه و مریخ
خوا
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به گود آمدند پهلوانان ما
به امید یاری به یاد خدا
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* یوز ایرانی
چرا ایران
چرا این خطه خوبان
دگرباره سیه پوش و عزادار است
بروزی
داغد
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از دل اندوه، نهال ایستادگی میروید و در بارش امید، سرود فتح طنین انداز می گردد...
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جهان بیرونی
همچون رویا
نیمهای / گمشدهست.
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چشم بدخواهانِ مُلک و میهنِ ما، کور باد_دست اهریمن زخاک و مرز و بومش دور باد
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دست ناپاک عدو، از خاک پاکت دور باد_در دفاع از خاک تو، پیر و جوان پرشور باد
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دست خون آلود دشمن از حریمت دور باد_چشم بدخواهان بی دینت، هماره کور باد
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خصم دونَت ای وطن، در نزد ما منفور باد_در هجومِ دشمن دون، لشکرت منصور باد
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🌿 غزل امید و مقاومت 🌿
من از برای دلِ شاد، سخت میجنگم
به راه طاقت و صبر، بیامان میجنگم
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ای وطن، دست اجانب، از حریمت دور باد_چشمِ بدخواهانِ تو، از هر دیاری، کور باد
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خاکی ام جنگ زده
سالیان درازیست چپاول گرگم
موران درونم هزار رنگ
با هزار نیرنگ
کشان کشان مسلخ ب
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خشم من
خشم من زیباترین حسم شده
حس عفو قاتلی در پای دار
حس وقتی که در عالم نیستم
حس روزای فقان
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نسیم دیرسال تاریخ
می وزد هنوز،
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جاری شد مانند سیل خون ما در روی خاک
پا یکجا سربه یکجا تن به حیران مانده است
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شام اگر آیینهدارِ خشمِ شبهای ستم،
کربلا آیینهدارِ کبریا با اربعین
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خلیج من از فارس؛ زاده شده
به نامش قسم، جاودانه شده
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تا قامتِ آزادگی افراشته شد_
از هیبتِ آفتاب، جا میزد مرگ...
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هلا؛ غاصبگرانِ شومِ صهیون
چموشی کرده بودید و
چو موشی گشتید اکنون
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وَطِن می تَن ، وَطِن می جان ، وَطِن می دین ، مِه ایمون
نَدونِسّی؟ مِرِه گِنّه ایران بانویِ کیجا..
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من از خودم آمده ام
از نسلی که مشت شد
بغض شد
اما گریه نکرد.
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شاعری خواست تا که بنویسد
از غریبی غزه در شعرش
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سوز چوخدی (یاسمین)ولی فرصت گرانیدی
قان شرم ائدیر ولی دیلی یوخدی نوا ائده
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هیچ دستی فاتح این خاک نیست
دشمن دون را، رهِ افلاک نیست
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در مورد یکی بودن حرف و عمل است.
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من از دیاری پرشکوه آمدم که برهم زنم تیرگی های جهان
من از شهر درغرق باروت آمدم که تا برکشم به اوج زم
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پرچمت بالاست آقاجان حسین ع
عشق پا برجاست آقاجان حسین ع
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وطن خون جاری شده در تنست
هوایش ز غیرت بسی روشنست
سرای دلیران بی باک و گُرد
نظر هر که کرد بر ا
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بار دیگر زاده شده عیسی مسیح
محرم آیینی حماسی
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از هجوم سگ و کفتار ندارم ترسی
کوه و دشت تو شده بیشه شیران ایران
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چون زمان خیبر آمد ای جهودان الفرار
ذوالفقار حیدر آمد ای جهودان الفرار
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این شعر، مربوط به زمانی است که به کشور عزیزمان، حمله صورت گرفت.
کنون وقت غرّش ز شیران جنگ است
هراس
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شعر وطن یعنی... بخش اول -
بخش دوم به زودی منتشر خواهد شد.
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شعر دوازده روز
از کیمیا ساعیان
*قسم بر خاک پاک مام مهدم
همان خاکی که هر جایش شهیدی ست
*ز نسل آ
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شعر از کیمیا ساعیان
*ای مادر دریایی، نامی پر از زیبایی
ای قدرت ایرانی، تاج خلیج مایی
*ای مادر
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در مورد این که ایرانیان مثل شیر هستند.
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جهان در سایهسار صلح خرم باد و آبادان
که از عطرش شمیم دوستی آید به این بستان
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مویه کردندچون تهمینه درسوگ سیاوش.......
این تماشاخانه پُربودازپرمرگ سیاوش.........
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تقدیم به شهدای جنگ تحمیلی
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دل اگر آتش بگیرد، رزم میدان میشود
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ای همیشه نام تو در اوج ای ایران من
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در ادامه بیتی از آن را نمایان می کنم
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چنان موشک زند ایران که شیطان چهره بگشاید
به دادِ بچّه ی منفورِ نامشروعِ خود آید
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«به نام خداوند جان و خرد ، کزین برتر اندیشه بر نگذرد»
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شعر کودکانه وعده صادق ...
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ساقی بنوشان باده ای، کاین دل نخواهد چاره ای
با من بگو از حکم عشق، تا سر دهد دیوانه ای
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ایرانیان،دلیران بی همتا
در ره حق،پیشتاز و بی پروا
گر هزاران فتنه پیدا گردد
با دلی استوار،وطن پابر
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به روزگار پر از جنگ مردمان مجاور...
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ز ما نیست عقبگرد، این راهِ ماست
پیِ فتح، هر خون که جاری، رواست
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هر چند سر به دامنه غم نهاده ایم
ما در چکاد حادثه هم ایستاده ایم
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ای غاصب کودک_کش مغلوب به میدان
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دیو چون دیوانه وغرق توهم می شود
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اساتید گرامی، نوشته های بنده در قد و قواره ی شعر خطاب شدن نیستن، بنابراین پیشاپیش از حسن توجه و وقتی
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چون کارد به استخوان رسد راهی نیست
حاجت به بیان معذرت خواهی نیست
یکبار زدی به صد جهت خواهی خورد
بی
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مادرم، ایران، هنوزم خانهات دارد پسر
از هجوم دسته ی گرگ بیابان، غم مخور
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آسمان
در چشمانشان تگرگ
کارونت
جاریست در رگ
تا با هر خروش
برساند
آواز وطن را تا ثریا
پ
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