جمعه ۱۰ اسفند
اشعار دفتر شعرِ چشم های تو شاعر لیلا طیبی (رها)
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متروک و خرابم،
چنان منزل عارف!
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ای بینهایت!
--وقتی ندارمت،
قلبم خلائیست
پُر ناشدنی!
لیلا_طیبی (رها)
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سراپا شعرم،
آه،،،
کسی نمیخواند مرا!
لیلا_طیبی (رها)
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جای خالیی تو را
با چه میتوان پر کرد؟!
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طاقت دل به سر آمد!
یادگاریهایت را جمع کردهام...
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پنجره ام،،،
بُغض کرده ست!
گمانم؛
آسمان هم
هوس باریدن دارد!
لیلا_طیبی (رها)
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برو!
ماندن بیفایدهست،،،
اگرچه؛
دلِ رفتن
نداری!
لیلا_طیبی
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آسمان که دلش میگیرد،
--ابری میشود
نمیدانم
چرا من،
هوای گریه دارم!
لیلا_طیبی (رها)
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فلاکت داشت
حالِ کارگرِ سیاه...
...
میان ثروتی بیپایان
در معدن الماس!
لیلا_طیبی (رها)
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میروی؟!
--مرا هم با خودت ببر...
من بی تو،،،
از خودم،
بیزارم!
لیلا_طیبی (رها)
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اتاقی تاریک وُ
حجمی از تنهایی
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وقتی،
کنارم نیستی؛
هر ثانیه کش پیدا میکند
به قدرِ یک قرن!
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بیهوده بود تکاپویم،،،
در فرهنگها...
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نباشی،،،
هجومِ سکوتی وحشی
جای جای خانه را
تسخیر میکند!.
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خط به خط؛
برای تو میگریم...
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در من زنیست،
--پُر از جنون!
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افسردگی ی مزمن گرفتهاند
پنجرههای اتاقکم...
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مهر آمدهست وُ،
دارم کوچههای شهر را
مشق میکنم...
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بودنت چندان نبود
که کودک خیالم را آرام کند...
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آیا به انقراض یوزهای ایرانی،
--اندیشیدهای؟!.
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تنهاییام،
پنجرهایست همیشه باز
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ذهنم آبستنِ فکریست؛ بدیع!
به ماماییاش آمده،
[قلم]!!!
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پلان شبانههایم،
دور از تو!
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برای "من"وُ،
این همه "تنهایی"!
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پاییز از راه بیاید،
دلتنگیست،،،
که از دل و جان میریزد!
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وَ ماهی؛
به قلاب پناه برد
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دلم پُر است!
کاکتوس گلدانم!!!
نه نوازش میشوم،
نه پناهم میشود آغوشی...
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برای رسیدن به تو،،،
راهِ میانبر را انتخاب کردم!
اما،،،
طولانیترین میانبر جهان بود!
لیلا_
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دوستت دارم ،،،
(تمام قد)
♥
"عشق"
نیاز به اثبات ندارد؛
--باور کن!
لیلا_طیبی (رها)
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این که با پاییز از راه میرسد،
باران نیست؛
--دلتنگیست!
لیلا_طیبی (رها)
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آغوشت،،،
آخخخ!
متقاعدم میکند،
--بهشت وجود دارد!
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خانه،،،
خیالاتی شدهست...
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خاطراتِ تو،
شبیه"عَشقه"(۱)
بر خاطرم پیچیده ست...
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اُسطورهی تمام شهر شدهست
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قرصِ رویِ ماهت،
مسکنیست؛
بر تمام شبهای پر دردم.
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عشق،،،
حدیثیست همیشه حادث...
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چشم انتظاریهایم،،،
پا برجاست...
♥
پرستویِ مهاجر؛
--بیا!
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دوستت دارم را
از چشمهایم بخوان!
♡
زبانم،،،
سالهاست بند آمده!
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چه مبارکی تو!!!
♥
کاش،،،
--اتفاق بیافتی...
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حوضچهای شد،
-چشمانم!
پُر از ماهیوُ اشک!!!
وقتی فهمیدم،
دیگر نمیبینم
-چشما
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آن قدر پُشتِ پایت اشک ریختهام؛
که درمن،
باغ های افسردگی ریشه دواندهاند.
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میجنگم با تنهایی
پشت خاکریز پر از مین دنیایم
بیتو،
هر گوشهای،
پا میگذارم
صدای مهیبی دارد
ا
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شبگرد کوچههای خیالام اما؛
--مغموم!
در این اندیشه که:
"کجای خیالتام"؟!
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دست به سر نمیشود
کودک لجباز خیال!!!
یک ریز بهانه میگیرد
--دستانت را...
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خم شده،
-- قامتم!
زیر وزنِ باری
که به دوش میکشم!
تنهایی این روزهایم...
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بارانی شدید وُ
دو لبِ فرو بسته
به زیر یک چترِ باز!
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سالهاست چشم دوختهام،،،
به راه آمدنت.
♡
به انتظارم پایان بده!
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