شنبه ۱۶ فروردين
اشعار دفتر شعرِ شام شیما شاعر شیما رحیمی (شمیم شیراز)
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من میگم هر شاخه گل یه نشون یه اعتقاد
تو میگی شاپرکها به گل ها بی اعتماد
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درهولوکاست امیدهایی ناامید
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زخمی خجر احساس ،تو ای زخمی تر از من
محاله به هم رسیدن سبزه ای گره نزن
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میری اما قبل رفتن تو چشام قدم بزن
هرچی جز خودت میبینی خط بزن قلم بزن
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اری می گویی به نبودن ها در رفراندوم ماندن و رفتن...
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شکار کردی دل که بزمی شود...
شیراز و اردیبهشت و عشق...
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شانه خالی کرده دل پشت نقاب یأس...
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تنها شب سیاه پوشید و عزا گرفت
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من شبم را از سیاهی چشمان تو ساختم...
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دلت لرزید... این زلزله بود..
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مرا لحظه ای بنگر ستاره
صدایم کن به نام قلب پاره
به یاد اور ان شب زیر مهتاب
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عشق راز سربسته بود ولی شکستم ان را تا که تو نیز بدانی کز التهاب اتش دل خواست که بسوزم
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به گل نشستم و وعده دریا شدم...
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سایه رو از شب گرفتم تا حقیقت و ببینه
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جدال بید و باد و سقوط برگ پاییز
نشکفتن های رویا این غروب غم انگیز
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مشق شب قصه ی دوست داشتن تو...
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که این سراب و ماسه ها تجلی وجودت است...
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خنجری که تو کشیدی نبرید کمند احساس
مُرده سَهَند دل من مرده را نیست شفایی
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گله ای نیست اگر جای دگر مهمانی
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پری از رفتن خالی از ارزو ها...
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نه من می دانم نه خاک که میعاد گاهم است
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احسنت به من احسنت که عشق اخرت بود...
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گفتی که نه مستی و نه هشیار ...
بنویس براین راه نبودم سزاوار
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می فروشند عشق را انان کز عشق دم میزنند...
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دریاب جا مانده گوشه حیاط بازی هایمان
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از اوهام بهانه بارید تا بگم از تو گذشتم
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بگذار همه دنیا بمیرند از این درد
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راز این گلبوته ها مشق عشق من و توست
طرح بال شاپرک نقش عشق من و توست
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به یاد او به یاد دل گذر عمر برلب جو
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گذشتی بر بهار من سردتر از باددی
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باید گذشت...
گرچه شکست...
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کم نمی اورمت
نگاه اخرت را مومیایی می کنم...
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شهرزاد شبهات بودم اما شب از 1001 گذشت
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پاییز اون حس غریب نیست که تو کوچمون بپیچه
عطر تاب و تبه که می گفتم به شبم بریز
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بس که راه رفتم برین تار های عنکبوت
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مرا بیاب...
کمی سیاه تر از شب شده ام
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و اتشی بود غروب برتن خونین درخت...
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به تو لبخند می زنم بی دلیل عاشقانه ای...
باز می سرایمت...
از ماگذشت فرصت جنون و عشق...
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به تو بخشیدم همه احساسم را
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انتگرال بگیرهمه احساسم را
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دود از کنده ها نیست... ما نسل سوخته ایم
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شعری که بیش از همه شعرهایم دوستش دارم...
من...
اخرین گل بهار...
کنج باغچه مانده ام...
باد پاییز
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زنجیر کرد پای شعرم را...
قلبم جز با او نرود...
شب مسکین تو
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ازتو دلگیرم...
اما باز هم از بی عشق ماندن می هراسم...
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از نومیدی تابوت ساختم
راستی تلخ تر هست
مرگ عشق و احساس...
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مال تو تموم شعرام که همیشه از تو سرشار
مال من همین سکوتت غم چشمای گرفتار
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اگر پنجره ها به تمنای تماشای نگاهی بازند
پس دیگر سیبی مجرم نیست...
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نارنجی پوشیده است جهان
به احترام دلم
به احترام خزان
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سکوت دل بریدن ها واسه فریاد امروزه
که از فردا نفسهامون همین فانوس خاموشه
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دستانت الوده انکار بهار
و من فانوس به دست...
گفتم که امیدی هست...
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